Vaastu and Cancer

वास्तुशास्त्र में रोग विचार

वास्तुशास्त्र में प्रमुख आठ दिशाओं का लेखा जोखा ज्यादा रहता है । इन आठों दिशाओं के अलग-अलग देवता एवम् ग्रह हैं । जिस प्रकार जन्म कुण्डली में 12 भाव होते हैं और प्रत्येक भाव के अलग–अलग ग्रह होते हैं । इनकी दशा-अन्तर्दशाओं में मानव पर जातक पर कभी अनुकूल और प्रतिकूल प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है । इसी प्रकार से ग्रह अपने शुभ और अशुभ प्रभाव से वास्तु की विभिन्न दिशाओं को प्रभावित करके वहां रहने वालों के जीवन पर शुभाशुभ प्रभाव डालते हैं ।

पूर्व दिशा

गंजापन, सिरदर्द, दिमागी परेशानियाँ, मस्तिष्क ट्यूमर, हड्डियां कमजोर होना, बच्चों में जन्मजात रोग होना, राजनैतिक समस्यायें, गया धन व उधार दिया गया धन वापस न मिलना । यहां के स्वामी देवताओं के राजा इन्द्र हैं और ग्रह सूर्य है । सूर्य देवता समृद्धि–प्रसिद्धि व बुद्धि विवेक व स्वास्थ्य के विशेष प्रतीक हैं ।

पूर्व दिशा में खराबी होने पर यश प्रतिष्ठा में कमी,संतान को कष्ट संतान के शरीर में विकलांगता, मन्दबुद्धि बच्चे होना, अपनी परंपराओं को तोड़ने वाले, कुलीन परिवार के भी होकर बदनामी कराने वाले या संतान को पिता के सुख की कमी होती है । सिर के रोग, हड्डी के टूटने, हड्डियों में कैलशियम की कमी होना, हृदय रोग, पेट की बीमारी, मस्तिष्क ज्वर, उच्च रक्तचाप, नेत्र विकार, पुरुष के दायें नेत्र व स्त्री के बायें नेत्र में पीड़ा होना, अपव्यय, ऋण का भार, प्रतिष्ठा में कमी, पितृ नाराज, इत्यादि, ।

उत्तर–पूर्व

मानसिक, अध्यात्मिक और आर्थिक सम्पन्नता में कमी, वंशवृद्धि में रुकावट, ई.एन.टी., वाणी में कष्ट, मधुमेह, एसिडिटी, बदहजमी, संतान का बिगडना, पुत्रों को कष्ट, संतान का भाग्य न बनना, पुत्र संतान की आकस्मिक मृत्यु हो सकती है । गृहस्वामी को पुत्र सुख में कमी, वंश विनाश, दरिद्रता, कूडा करकट होने से चरित्रहीनता व शत्रुता होना, रसोई होने से आर्थिक हानि, गृहक्लेश, शौचालय होने से दुश्चरित्रता, गृहकलह, बीमारियां, पीलिया, लीवर, मोटापा, दिमागी कैंसर, कर्जा बढना, उधार वापस न आना, कुल गुरु, ब्राह्मण का शाप, कानूनी परेशानियां, बच्चों के कैरियर खराब होना ।

उत्तर

हर्निया, हृदय सीने के रोग, हैजा, फेफड़े, ठंड से होने वाले रोग, दरिद्रता अभावग्रस्तता, चर्म रोग, गाल ब्लेडर, धन हानि, मतिभ्रम, मोटापा, सूंघने की शक्ति का क्षीण होना, त्वचा रोग, तर्कशक्ति में कमी, वाणी में हकलाना, नपुंसकता, बहन, बेटी बुआ को ससुराल से कष्ट, बार–बार थूकने का रोग ।

दक्षिण–पूर्व

स्वास्थ्य का संबंध इससे सबसे ज्यादा है । रसोई–छोटी सी डिस्पेन्सरी भी है । सौन्दर्यदायी जगह, सब कुछ भोजन पर निर्भर । शयन सुख, शैय्या सुख में कमी, जननेन्द्रियाँ के रोग, सीधे हाथ में कष्ट, दायाँ घुटना, नेत्र रोग, रेटिना में खराबी, दायें कान में बहरापन, गूंगापन, छाती तिल्ली आदि में कष्ट । प्रजनन क्रिया में कष्ट हो सकता है । यौन संबंधो में असमर्थता, क्रोध की अधिकता, अन्य स्त्री पुरुषों द्वारा संसंर्ग से उत्पन्न रोग, मधुमेह, अग्नि भय, स्त्रीयों का स्वास्थ्य खराब, स्त्री पुरुष की बात को महत्व नहीं देती । श्रंगार में खर्च ही खर्च ।

दक्षिण

सीने में दर्द, हृदय रोग, जोडों का दर्द, लीवर की खराबी, पीलिया, स्त्रियों के मासिक धर्म में अनियमितता, गर्भपात, लाल रक्त कणिकाओं में कमी होना, एनिमिया होना, रक्त विकार जैसे हाई ब्लड प्रेशर, बवासीर, फोड़े–फुन्सी, शरीर में टांके लगना, अस्थि मज्जा, पेट में अलसर, आँतों में जख्म होना, समाज में ऐसा अपना जो आत्महत्या के लिये मजबूर कर दे । स्त्रीयों को कष्ट ।

दक्षिण पश्चिम

अकस्मात होने वाली दुर्घटनाएं, किडनी, पैर, कूल्हे, पैर में रोग, छूत की बीमारियां, अण्डकोषों का बढ़ जाना, एग्जीमा, त्वचा में खूजली इत्यादि । आयु में कमी, शत्रु द्वारा पीड़ा, असा/य रोग, हाथी पैर, मवाद भरना, लाइलाज रोग, दौरे पड़ना, गुप्तांगों के रोग, नर्वसनेस, भूत–प्रेत, ऊपरी हवाओं का असर, पितरों की नाराजगी, राजनैतिक गुण्डों से परेशानी, जेल, हत्या, आक्रमण इत्यादि । व्यवहार व चरित्र के विकास में बाधएं, अन्ध विश्वास, विषपान, वैमनस्य ।

पश्चिम

लाइलाज बीमारियां, लम्बे समय तक चलने वाले असाधय रोग, नसों का उभार, ठंड से होने वाले रोग, कब्ज, बवासीर, उदासीनता, डिपरेशन, कुष्ठरोग, गठियाबाय, स्नायु प्रणाली बिगडना, पेट में गैस, अफारा बनना, स्त्रीयों के चरित्र में कमी आना, वात रोग, जेल, नपुंसकता वैराग्य ।

उत्तर पश्चिम

मानसिक संतुलन में कमी, मित्रता की गलतफहमियां, नाभी पेट का ऊपरी भाग, बडी आयु की स्त्रियों को रोग, घर में भय का वातावरण, हृदय रोग, छाती के रोग, टी.बी., सर्दी जुकाम, निमोनिया, अपेन्डिक्स, मासिक धर्म में परेशानियां, गर्भाश्य के रोग, शरीर में पानी की कमी होना, सांस की परेशानियां, मित्रता व शत्रुता में परिवर्तन का दोष, बच्चों का घर से दूर रहना, पागलपन, विषाद, मानसिक तनाव, कफ प्रवृति, मां बनने में कष्ट, उन्माद, नौकरों से परेशानियां, मोटापा, पुलिस, कोर्ट–कचहरी की परेशानियाँ ।

– बिना दरवाजे के भवन में निवास भयंकर दोष ।
– नीच सूर्य में दुकान फैक्टरी की स्थापना कलह का कारण होती है ।
– व्यवसायी का सूर्य नीच राशि का हो तो लाभ होने पर भी कष्ट एवं आत्मिक क्लेश ।
– भू–शयन होने पर कल कारखाना, फैक्टरी इत्यादि लगाना अपवयय और अज्ञात बाध देता है ।
– ईशान में भट्टी हो तो व्यापार में खिन्नता, दीवालियापन ।
– उत्तर में भट्टी हो तो लाभ के अनुपात में व्यय अधिक, फैक्टरी मंदी और ताला बंदी तक की नौबत आ सकती है ।

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